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कुण्डलिया




कुण्डलिया


1.

जैसी    बोई  आपने ,  वैसी   लेना   काट ,
अच्छाई हरदम फले , अपयश  बारह बाट .
अपयश बारह बाट , बदी से बचकर रहना ,
घटता जिससे मान , बात ना ऐसी  कहना .
कह गुलिया कविराय , रीत ये देखो कैसी ,
गाए    वैसे  गीत , मिली थी शक्कर जैसी . 

2.
मानें    बेटा     बेटियाँ , जग  में  एक   समान ,
लगे    समझने   बात  ये ,    बहुतेरे      इंसान .
बहुतेरे      इंसान , सुता   को     खूब   पढ़ाते ,
जिनके नेक विचार , जगत   में   आदर    पाते .
कह गुलिया कविराय , सुता को सुत सम जानें ,
बेटी  कुल  का   मान , पराया  धन   ना    मानें

3.
रिश्तों से घटने लगा , अब दिन प्रतिदिन प्यार ,
रोज   सवेरे  बात ये , बता     रहा    अखबार .
बता  रहा अखबार ,  वधू   ने  वर   को  मारा ,
वहशी  बनता बाप ,  मातु  भी  करे   किनारा .
हुआ अजब ये हाल , लगे जन  जन से कटने ,
लगा तभी तो  प्यार , आज  रिश्तों   से  घटने .
4.
आशा  औ'  विश्वास  का , लें  जो  दामन थाम ,
मिलता उनको एक  दिन , अपना सही मुक़ाम .
अपना सही मुक़ाम , वही जन  हासिल  करते ,
मकसद जिनका नेक , नहीं   संकट  से   डरते .
कह गुलिया कविराय , विपद ने  जिसे  तराशा ,
माने  ना    वो    हार , बसी है जिस मन आशा .  

5.
जाने   कैसी    गाँव    में , फैली   है  ये आग ,
जिसको  देखो अब वही , रहा नगर को भाग .
रहा नगर को भाग ,  मिले  ना  ठौर -ठिकाना ,
सोने  को  फुटपाथ , पड़े   होटल   में   खाना .
कह गुलिया कविराय , हुए  हैं   जन   दीवाने ,
कैसा    कारूँ  कोश ,  वहाँ  पर भगवन जाने .
6.
चादर से बढ़कर कभी , ले   जो   पैर  पसार ,
होता  अपने  नाश का , खुद  वह   जिम्मेवार .
खुद वह जिम्मेवार , किसी  की  जो ना  माने ,
होगा   क्या  अंजाम , नहीं   इतना  भी  जाने .
कह गुलिया कविराय , मिले ना उसको आदर ,
फैलाते   जो   पैर ,  बिना    ही    देखे   चादर .

7.
कौन किसी से पूछता , आज बैठ कर हाल ,
समझ मुझे आया नहीं , जग का मायाजाल .
जग का मायाजाल , फोन पर प्यार  जताते ,
कितने     रिश्तेदार , रुग्ण से  मिलने   जाते .
कह गुलिया कविराय , संबंध आज उसी से ,
जो है मालामाल   , पूछ  ले  कौन  किसी से.

8.
मिलता  बिछुड़ा  मीत  जब , होता  हर्ष   अपार ,
 जैसे     उजड़े     बाग    में , आई  मौज  बहार .
 आई   मौज  बहार  ,  खिली हो  क्यारी  क्यारी ,
कही समय पर बात ,  लगे  है    सबको    प्यारी .
कह गुलिया कविराय , याद  से  मुखड़ा  खिलता,
कुछ  मत  पूछो  यार ,  यार जब बिछुड़ा  मिलता
9.
जीना अपने  हाथ , ना , मरना  अपने  हाथ ,
इन बातों  का  राज़  वो ,  जाने     दीनानाथ .
जाने    दीनानाथ ,  टले   न   मौत  ये  टाली ,
आए  खाली हाथ , गए    तो    मुट्ठी   खाली .
कह गुलिया कविराय , लगे जब पार सफ़ीना ,
कह     ऊठे   संसार   , यही  है सच में जीना 

10.
 हरियाली   घटने  लगी ,  बढ़ने   लगे   विकार ,
इधर  विषैली  गैस  तो , उधर  धुएँ   की  मार .
उधर धुएँ   की  मार ,  हुई   दूषित   जलधारा ,
लगता     पर्यावरण  ,  अब  प्रदूषण  से  हारा .
कह गुलिया कविराय , जगत में हो खुशहाली ,
खूब      लगाओ   पेड़ , बढ़ेगी  तब  हरियाली .

11.
आकर भ्रष्टाचार  का , देखो   भगवन   खेल , 
गुनहगार  होते   रिहा , बेगुनाह    को   जेल .
बेगुनाह को जेल , बेल  ना  उसको   मिलती ,
फाइल तक भी ईश , बिना रिश्वत ना  हिलती .
कह गुलिया कविराय , डरें ना हाकिम चाकर ,
देख कभी भगवान , धरा  पर  तू  भी आकर .
12.
काया जितना कर्म कर , दौलत जितना धर्म ,
जो भी जितना मान  दे , उसकी उतनी  शर्म .
उसकी उतनी  शर्म ,  हमें  भी मान  दिलाती ,
तजते  जब  संसार  , साथ  नेकी  ही  जाती .
कह गुलिया कविराय , चले न साथ ये माया ,
काल    करेगा   राख , यहाँ कंचन सी काया .

13.
पैसे  खातिर  देख लो , करते  लोग   फरेब ,
सभी  जानते  खूब ये , नहीं कफ़न में  जेब .
नहीं कफ़न में जेब ,  करें  ये  जोड़ा  तोड़ी ,
खींच रहे सब माल , देख  लो   होड़ा होड़ी .
कह गुलिया कविराय , बताएं  इनको कैसे ,
नहीं  किसी  के साथ , गए हैंअब तक पैसे .

14.
अँधियारा कहने लगा , एक  दीप  से आज ,
देख  लिए  हैं  आपसे , बहुत   हेकड़ीबाज .
बहुत हेकड़ीबाज , न  जाने   कितने  आए ,
रहे  सभी  वे  खेत , मिटा ना  मुझको  पाए .
कामुक हो या चोर , चाहते    संग    हमारा ,
कितनों की है चाह , मिटे जग से अँधियारा .

15.
कितने   शातिर   लोग  ये , घोटालों  में दक्ष ,
 क्यों  ना  डर कानून  का , प्रश्न यही है यक्ष .
प्रश्न  यही   है  यक्ष , मदद  ये  किससे  पाते ,
दे  इन्हें  अभयदान ,  बताओ  कौन   बचाते  .
सारे    खोटे    काम  , करें ये  दौलत खातिर .
छोड़ें   पल   में   देश , लोग ये कितने शातिर .
16.
करके   नेकी   यार   तू , जाना उसको भूल ,
यही बड़ों का  कथन  है , यही धर्म का मूल .
यही धर्म का मूल , वचन  ना  उनका  भूलो ,
धरा न देना छोड़ ,  भले  ही  नभ को छूलो . 
कह गुलिया कविराय , बदी से रहना  डरके ,
कभी  न  रखना याद , जगत में नेकी करके .

17 .
बोलें   देखो  जोर से , खोल  रहे   निज  भेद ,
जैसे  अपनी नाव में ,  मूरख    करता    छेद .
मूरख करता छेद , उसे   तो  समझ  न आए ,
नैतिकता का पाठ , पढ़ों  को   कौन   पढ़ाए .
कह गुलिया कविराय , ज़हर  ये  ऐसा  घोलें ,
जहाँ   शोभता   मौन , वहाँ  ये  बढ़चढ़  बोलें .

18.
मुखिया  के हैं  आज ये ,    सच्चे       ताबेदार ,
टीवी   देखो   शाम  को , सुबह  पढ़ो अखबार .
सुबह  पढ़ो  अखबार ,  गीत मुखिया  के गाता ,
कितना हुआ विकास ,  आंकड़ों  में  उलझाता .
मनवांछित   पा  दाम ,  बने  ये  दोनों  सुखिया ,
कहते  वो  ही    बात , इन्हें जो कहता मुखिया .

19.
तुम ही  मेरे  मीत हो , तुम   ही   मेरी  प्रीत ,
तुम ही  मेरी  हार हो , तुम   ही  मेरी  जीत .
तुम ही मेरी जीत ,  लगें  सब   झूठी   बातें 
बदल रही हर रीत , प्यार  में   बसती  घातें  ,
कह गुलिया कविराय , हविस ने डाले  डेरे ,
झूठे       लगते   गीत , मीत हो तुम ही मेरे.

20.
कहना   तो  कह   सामने , खुले बात की पोल ,
कह न सको यदि  सामने , फिर पीछे मत बोल .
फिर पीछे  मत बोल ,  इसी   में   कहें   भलाई ,
बुरे  सभी   वो  लोग ,  मीत   की   करें   बुराई .
कह गुलिया कविराय, सुखी  गर  चाहो   रहना ,
कहनी  हो  जो  बात , सदा मुख पर ही  कहना.

11.
करते सारे जीव ये , तब तक बढ़िया खेल ,
रहे  मदारी हाथ में , जब तक कसी नकेल .
जब तक कसी नकेल , करेंगे खूब तमाशा ,
गर दी ढीली छोड़ , मिलेगी  यार   हताशा .
कह गुलिया कविराय , बात ये  डरते डरते ,
जिन पर  रहती  दाब , नहीं मनमानी करते .
               
12.
मिलते   हैं  घृतराष्ट्र  से ,  अब भी  कुछ इंसान ,
ताज मिले औलाद  को , हैं   जिनके   अरमान .
हैं जिनके अरमान , फिरें   वो   जुगत  भिड़ाते ,
पूरी   करने   साध , जनों    का   खून   बहाते .
कह गुलिया कविराय , घुटाला कर के  खिलते ,
करें   मुल्क  की बात ,  कहाँ जन  ऐसे  मिलते .
              
13.
जाने  कैसा  हो  गया , जन का आज  मिज़ाज ,
हो कितनी भी पीर पर , मिलता  हँसकर  आज .
मिलता हँसकर आज , नहीं   निज  पीर  बताए ,
झुलसा   रहा   तनाव ,   बिना  ही  आग जलाए .
कह गुलिया कविराय , दिखाए   बस   ये   पैसा ,
छुपा  रहा    अवसाद , हुआ   जन   जाने  कैसा .
                
14.
करना न तुम कभी नशा , बहुत  बुरी ये चीज़ ,
रहती  इसमें  कब  भला ,  कहाँ कोई  तमीज़ .
 कहाँ  कोई  तमीज़ ,  ख़ुमारी    चढ़ती   ऐसी ,
जो  दे उसको  सीख , करे    ऐसी   की   तैसी .
कह गुलिया कविराय , बुरी  आदत  से  डरना .
करता तन का नाश , नशा तुम कभी न करना .

15.
कैसी अब  ये   सीख ली , नेता   ने    तक़रीर ,
शब्दों  में   गरिमा  नहीं , ना   वाणी  में   धीर .
ना   वाणी  में   धीर ,  बकें   हैं   जैसे   गाली ,
सुनकर जिसको भीड़ , बजाए खुलकर ताली ,
कह गुलिया कविराय , सियासत ना थी ऐसी ,
कैसे  हैं  ये    लोग ,    बनाएं   बातें     कैसी .

16.
रिश्ते  अब   रिसने  लगे , सुलग रहे जज़्बात ,
यही हकीकत आज की , कर लो तहकीकात .
कर लो तहकीकात , नहीं  बाबा   की    मानें ,
लिए फिरें हथियार ,  जिसे  अपनों  पर तानें .
कह गुलिया कविराय , लगें वो लोग फरिश्ते ,
करते   सबका   मान , निभाते  हैं  जो  रिश्ते .

17.
सारी  बस्ती   जब   हुई , आतिश में तब्दील ,
तब वो अमन बहाल की , करने लगे अपील ,
करने  लगे  अपील ,  न  बिगड़े     भाईचारा ,
जल को करके कैद , आग को करें    इशारा ,
कह गुलिया कविराय, समझते सब मक्कारी ,
करी अमन  की  बात , फूँक दी  बस्ती सारी .

18.
पैसे  खातिर  देख लो , करते  लोग   फरेब ,
सभी  जानते  खूब ये , नहीं कफ़न में  जेब .
नहीं कफ़न में जेब ,  करें  ये  जोड़ा  तोड़ी ,
खींच रहे सब माल , देख  लो   होड़ा होड़ी .
कह गुलिया कविराय , बताएं  इनको कैसे ,
नहीं  किसी  के साथ , गए हैं अबतक पैसे .

19.
रोटी  खातिर  जो करें ,  खून  पसीना    एक ,
बिरले ही अब रह गए , ऐसे   सज्जन    नेक .
एेसे सज्जन  नेक ,  करें  जो   नेक    कमाई ,
करते सबका  मान , मानकर   अपना     भाई .
कह गुलिया कविराय , न हसरत इनकी मोटी ,
हो  छोटा  सा  वास ,  मिलें  बस कपड़ा  रोटी.

20.
लगते  आज हकीम भी ,  बहुत   बड़े   हैवान ,
धन  से  बढ़कर  मानते , नहीं किसी की जान .
नहीं किसी की  जान , तनिक भी इनको प्यारी,
खींच   रहे   ये   माल , बने    हैं      कारोबारी .
कह गुलिया कुछ लोग, डरा  कर  ऐसा   ठगते ,
जिसका पड़ता काम  , उसे  तो   दानव  लगते .

21.
हरियाली   घटने  लगी ,  बढ़ने   लगे   विकार ,
इधर  विषैली  गैस  तो , उधर  धुएँ   की  मार .
उधर धुएँ   की  मार ,  हुई   दूषित   जलधारा ,
लगता     पर्यावरण  ,  अब  प्रदूषण  से  हारा .
कह गुलिया कविराय , जगत में हो खुशहाली ,
खूब      लगाओ   पेड़ , बढ़ेगी  तब  हरियाली .

22.
मानें    बेटा     बेटियाँ , जग  में  एक   समान ,
लगे    समझने   बात  ये ,    बहुतेरे      इंसान .
बहुतेरे      इंसान , सुता   को     खूब   पढ़ाते ,
जिनके नेक विचार , जगत   में   आदर    पाते .
कह गुलिया कविराय , सुता को सुत सम जानें ,
बेटी  कुल  का   मान , पराया  धन   ना    मानें.

23.
जकड़े जो  खुद लोभ ने , करें  त्याग  की  बात ,
अब  ऐसी   ही   हो  गई , ये  आदम  की  जात .
ये आदम  की जात , बात  पर अब ना  टिकती ,
लाख टके की आन , भाव  कौड़ी   के  बिकती .
कह गुलिया कविराय , गए जो कल ही  पकड़े ,
पढ़ा  त्याग  का  पाठ , मिले  माया   में  जकड़े .

24.
तेरा  मेरा   कर   रहे ,  नहीं  ईश  का   ध्यान ,
घर से निकलें भोर में ,  ज्यों नभ में दिनमान .
ज्यों नभ में दिनमान , सुबह से शाम विचरता ,
करे न  जन   आराम , हमेशा  कारज  करता .
कह गुलिया कविराय , पकड़ ले खाट कमेरा ,
हो  उस  दिन  मालूम , नहीं   है  कोई    तेरा .

25.
सबका मालिक एक है ,  छोड़ो  वाद- विवाद ,
मानवता की टहल को ,  बना   धर्म    उन्माद .
बना   धर्म   उन्माद ,  सेवा  न  इससे  बढ़कर ,
मिले यही बस सीख, धार्मिक  पुस्तक पढ़कर .
कह गुलिया कविराय , सार ये हर मज़हब का .
सभी   धर्म   हैं   नेक , एक है मालिक सबका .

26.
जीते   जी   का   बैर  ये , जीते   जी   की   प्रीत ,
अपनों  खातिर  मर  रहे , यही   जगत  की  रीत .
यही  जगत  की  रीत , कौन  अब  रब  से  डरता ,
भले   मरे     संसार , आज  ही  कल  का  मरता .
कह गुलिया कविराय , भरें   सब   अपने     रीते .
 होते  वो  जन  नेक  , नहीं   निज  खातिर  जीते .
                  
27.
क़र्ज़ बुरा है  बाप का , लो बस इतना मान ,
इसे  फूस   से  तापना , कहें  गुणी   इंसान  .
कहें गुणी  इंसान , रात  निंदिया  ना   आवे ,
सिर पर रहे सवार , शाह   जी  रोज  डरावे .
कह गुलिया कविराय , यार  ये  मर्ज़ बुरा है ,
देखे    ना   दिन  रात , सताए  क़र्ज़  बुरा है .
                
28.
डालें   हरदम   वोट  वो , मन  में   लेकर आस ,
इक ना  इक दिन तो सुने , जनसेवक  अरदास .
जनसेवक अरदास , कहाँ कब किसकी सुनता , 
लेकर   भागे    वोट , यही  है   खास  निपुनता .
कह गुलिया कविराय , वहम ना दिल  में  पालें ,
जनहित जिसकी सोच , वोट उसको  ही  डालें .

29.               
जाने  कैसा  हो  गया , जन का आज  मिज़ाज ,
हो कितनी भी पीर पर , मिलता  हँसकर  आज .
मिलता हँसकर आज , नहीं   निज  बात  बताए ,
झुलसा   रहा   तनाव ,   बिना  ही  आग जलाए .
कह गुलिया कविराय , दिखाए   बस   ये   पैसा ,
छुपा  रहा    अवसाद , हुआ   जन   जाने  कैसा 
30.
बातें  सुनकर  झूठ  की , सब  जन  थे संतुष्ट ,
सच आया  जब  सामने , हुए  बहुत  से  रुष्ट .
हुए बहुत से रुष्ट , सत्य   अब  किसे   सुहाए ,
झूठ लगाए दौड़ , जहाँ  सच   चल  ना  पाए .
कह गुलिया कविराय , सत्य को मिलती मातें ,
पाती आदर मान ,  आजकल     झूठी   बातें .

31.
क़र्ज़ बुरा है  बाप का , लो बस इतना मान ,
इसे  फूस   से  तापना , कहें  गुणी   इंसान  .
कहें गुणी  इंसान , रात  निंदिया  ना   आवे ,
सिर पर रहे सवार , शाह   जी  रोज  डरावे .
कह गुलिया कविराय , यार  ये  मर्ज़ बुरा है ,
देखे    ना   दिन  रात , सताए  क़र्ज़  बुरा है .

32.
डालें   हरदम   वोट  वो , मन  में   लेकर आस ,
इक ना  इक दिन तो सुने , जनसेवक  अरदास .
जनसेवक अरदास , कहाँ कब किसकी सुनता , 
लेकर   भागे    वोट , यही  है   खास  निपुनता .
कह गुलिया कविराय , वहम ना दिल  में  पालें ,
जनहित जिसकी सोच , वोट उसको  ही  डालें .

33.
तेरा  मेरा   कर   रहे ,  नहीं  ईश  का   ध्यान ,
घर से निकलें भोर में ,  ज्यों नभ में दिनमान .
ज्यों नभ में दिनमान , सुबह से शाम विचरता ,
करे न  जन   आराम , हमेशा  कारज  करता .
कह गुलिया कविराय , पकड़ ले खाट कमेरा ,
हो  उस  दिन  मालूम , नहीं   है  कोई    तेरा '

34.
चाहत दौलत की सदा ,  पैदा   करे    फ़ितूर ,
मन  में  गर  संतोष हो , खुशी   मिले  भरपूर .
खुशी  मिले भरपूर , रहे  ना  इच्छा  धन  की ,
खूब   कमाएं  दाम ,  हुई  ये  हसरत जन की .
कह गुलिया कविराय , मिलेगी   कैसे   राहत ,
घटा  आज   परितोष , बढ़ी है धन की चाहत .

35.
कारज करना बाद में , पहले    सोच- विचार ,
बिना विचारे जो  करें , मिलती  उनको   हार .
मिलती उनको हार , न  कभी व्यूह सा  रचते ,
करते खूब विचार  , शत्रु  कब   उनसे  बचते .
कह गुलिया कविराय , न दोष ग़ैर सिर धरना ,
पहले   सोच   विचार ,  बाद में कारज करना .

36.
तोड़ो  नहीं  उसूल  को , चुनो  गलत  ना  राह ,
प्यासा चातक ताल की ,  मानें  कहाँ    सलाह .
मानें कहाँ सलाह , भरा   वह   नीर  न    पीता ,
एक बूँद की आस , धरे   धीरज    वह    जीता .
कह गुलिया कविराय ,कभी न  सत्य पथ छोड़ो ,
मिलें सुखद परिणाम , सनातन  नियम  न तोड़ो .

37.
झूठे   पाते   पत   नहीं , हो  सच्चे  का  मान ,
झूठ साँच की बस यही , मिली एक  पहचान .
मिली एक पहचान , छुपे   ना   झूठ   छुपाए ,
मिलकर लाखों झूठ ,हरा  ना  सच  को पाए .
कह गुलिया कविराय , चलन ये  देख अनूठे ,
सच  सहता  अपमान , मान  अब पाते  झूठे .

38.
मानें  बातें    ग़ैर     की , खुद में नहीं  विवेक ,
ऐसे  भकुआ  लोग भी , मिलते  यहाँ  अनेक .
मिलते यहाँ अनेक ,  पालतू    जीवन   जीते ,
लिए पराई   प्यास , लहू  अपनों   का   पीते .
कह गुलिया कविराय , मर्म  ना  इतना  जानें ,
उनको     कैसे   आप , बताओ  ज्ञानी   मानें .

39.
आशा  औ'  विश्वास  का , लें  जो  दामन थाम ,
मिलता उनको एक  दिन , अपना सही मुक़ाम .
अपना सही मुक़ाम , वही जन  हासिल  करते ,
मकसद जिनका नेक , नहीं   संकट  से   डरते .
कह गुलिया कविराय , विपद ने  जिसे  तराशा ,
माने  ना    वो    हार , बसी है जिस मन आशा .


संपर्क सूत्र :-
            राजपाल सिंह गुलिया 
राजकीय प्राथमिक पाठशाला भटेड़ा 
तहसील व जिला - झज्जर ( हरियाणा )

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