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बालगीत





बालगीत

           भूखा बंदर 
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छ्त   से   उतरा   बंदर    भूखा .

खाना  था  बस   रूखा    सूखा .

बंदर  जी   का  दिल   ललचाया .

खाना  खूब   दबा  कर    खाया .

लगा     तड़फने   कोई     आओ .

पेट  दर्द   की   दवा      दिलाओ .

डॉक्टर     भालू    भागा   आया .

नब्ज   देख   उसको   धमकाया .

पहले   उल्टा    पुल्टा       खाते .

फिर तुम पेट   पकड़   चिल्लाते .

उठो ,  अब  खुद  को   संभालो .

आँखों   में  ये   सुरमा     डालो .

बंदर    बोला    यूँ      हकलाते .

पेट....दर्द....की ..औषध..लाते .

भालू  ने   ये    कह   समझाया .

बीमारी   का    करूँ    सफाया .

गर   ठीक   से    देख   पाओगे .

बासी    भात    नहीं    खाओगे .


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       सूरज मेरा मीत 

सूरज   मेरा   मीत   बने  तो ,
      मंद करूं मैं इसका तेज !

कुल्फी  इसको रोज  खिलाऊँ .
बर्फ   डालकर   नीर  पिलाऊँ .
शीत  लहर जब यौवन पर हो ,
आग जला  कर  तेज  बढ़ाऊँ .
आग   उगलने   लगे  कभी  ये ,
        हो शीतलता से लबरेज !  ::::::::

दोनों    नदी    किनारे     जाएं .
मलमल  कर  हम  खूब  नहाएं.
नीर  नदी   का   लगे   उबलने ,  
 तब फिर हम घर वापिस आएं .
हाथ  जोड़  सब  करें निवेदन , 
         इसको अंबर में दो भेज !  ::::::::
बात   सभी    ये    मेरी     माने .
ना   कोई    सिर   छाता    ताने .
कभी  इसे  नभ   में    जाने    दूँ ,
रखूं    कभी   इसको   तहखाने .
कहाँ  हुए   हैं   दिनकर  गायब ,

      फैले खबर सनसनीखेज !



बालगीत हिंदी


इधर   चहकता   मिला   कंगुरा ,

     उधर सिसकती है बुनियाद !

हल्फनामा    मौन   हुआ   जहाँ ,
          मौखिकता पाती है मान .
 ढंग  देख  कर  आज  तेग  का ,
           करे बगावत देखो म्यान .
रिश्ते  भी   तब   रिसने    लगते ,
       बरसे  जब  इनमें  फौलाद .

चाहत  जिनकी   बस  जन्नत  है ,
            हूरें  जिनकी  रही  पसंद .
जिम्मा    लेते    हर    गुनाह   का ,
                 हुए हौसले देख बुलंद.
मार   रहे     हैं    अपनों   को   ही ,
               लेकर  गैरों से  इमदाद .

दिन    लगते   हैं    आग     उगलते ,
               थकी थकी सी लागे रात .
अब   साजिश   के  संग   निकलती ,
                 बनी ठनी सी टेढ़ी बात .
मुफ़्तखोरों    की     मेरे    देश     में ,

                  बढ़ी हुई है अब तादाद .



चल मेरे घोड़े

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चल मेरे घोड़े , चल चल चल ,
हमको पकड़े किसमें  है बल .
             चल मेरे घोड़े ......

आज  हवा  से  बातें   करना ,
नहीं  किसी आफत से डरना .
जो  है  डरता , वो   है  मरता ,
कोशिश से ही निकलेगा हल .
             चल मेरे घोड़े .......

आगे    जाए     पीछे     आए ,
लेकिन तनिक  सरक  ना पाए .
अडियल टट्टू   ,  बनकर   लट्टू ,
दुखी करे ये  मुझको  पल पल .
                चल मेरे घोड़े .......

खाता   ना   ये      दाना   पानी ,
याद   दिला  दी   मुझको  नानी.
चाबुक     खाए , दौड़   न  पाए ,
अब  हाथ  रहे  हैं  हम भी  मल .
               चल मेरे घोड़े .........

कहना  मत   तुम   चलो  निगौड़े ,
काठ     अश्व    ये   कैसे     दौड़े  .
हम   हैं   बच्चे   , दिल  के  सच्चे ,
घुड़सवार  की  हम   करें   नकल .
                   चल मेरे घोड़े .......


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अभिभावक     अध्यापक     सारे ,
           आपस में अब करके मेल .
 अब    हरगिज  ना     होने    देंगे ,
          इस नकल को डालें नकेल .

बात    ज्ञान    की     समझो  भाई ,
नकल      है     सामाजिक   बुराई .
सारे         बच्चे     आगे       आएं  ,  
आज   सभी   ये    कसम    उठाएं  . 
नकल   करेंगे   ना    हरगिज    भी ,
             बेशक हम हो जाएं  फेल .

हाथ   नकल  का   पकड़  न चढ़ना ,
नहीं    कभी     यूँ     आगे    बढ़ना .
निठल्ला   है  खुद  को   ही  छलता ,
बिन  परिश्रम  कब   मिले सफलता .
व्यर्थ  फल   की   आस   ना  करना,
          मानो  इसको  इक विष बेल .

नकल    सदा     ही    नाक   कटाए ,
कहाँ     किसी    का    मान   बढ़ाए .
ध्यान    धरे      जो    बच्चा   पढ़ता ,
जीवन     में     वह     आगे   बढ़ता .
पढ़ना    बहुत    जरूरी     है   फिर ,
              लेना तुम जी भरकर खेल .

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पानी भर कर लाए बादल ,
फिरते  हैं  इतराए  बादल .

कितने  हैं  ये  काले  काले ,
लगता  नहीं  नहाए  बादल .

बदल बदल कर रंग रूप ये ,
हमको  खूब  डराएं  बादल .

बैठ  गगन में पवन अश्व पर ,
कैसी  दौड़   लगाएं   बादल .

गड़गड़ करके खूब गरजते ,
जब  गुस्से में  आएं  बादल .

दिन की रात करें ये पल में , 
जब सूरज पर  छाएं बादल .

दादुर  झींगुर मोर  सभी  के ,
मन  को   हैं  हर्षाएं  बादल .

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   राजकीय प्राथमिक पाठशाला भटेड़ा
  तहसील व जिला - झज्जर ( हरियाणा )

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