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कुण्डलिया,kundaliya,कुण्डलिया छंद,hindi kundaliya ,राजपाल सिंह गुलिया

                     



              कुण्डलिया


1.
अपना दुखड़ा  रो  रहे ,  समझें  ना   पर - पीर ,
जन समझाना हो गया , अब   तो   टेढ़ी   खीर .
अब तो टेढ़ी खीर , मनीषी    खुद    को   मानें ,
सच  देते  हैं  ढाँप , झूठ     की     चादर   तानें .
कह गुलिया कविराय , व्यर्थ है प्रभु का जपना ,
दूजे    का    गर   दर्द , नहीं   समझोगे  अपना .
2.
आजादी  के मायने , क्या मौलिक अधिकार ,
पूछे  भोलाराम अरु ,    समझाए    मुखतार .
समझाए  मुखतार , काम से काम रखा  कर ,
हुजूर  माई  बाप ,  याद   ये  नाम  रखा  कर .
कह गुलिया कविराय , बात  ये  सीधी  सादी ,
रहे  धनिक  की  जेब , गरीबों   की  आजादी .
3.
रसना  उगले  आग  तो ,  नयनों   उतरा     खून ,
नफरत दिल में बढ़ रही , सिर  पर   चढ़ा  जुनून .
सिर पर चढ़ा जुनून ,  चाह   अब   बढ़ती   जाए ,
देह    हुई   कंकाल , हविश  को   कौन   मिटाए .
कह गुलिया कविराय , चले कुछ मन पर बस ना ,
देती    ये    भी    पीर , अगर ना  वश  में  रसना .
4.
खाली  जेहन   में    रहे , शैतानों  का वास ,
बना  बना  जो  योजना ,  देते   हैं    संत्रास .
देते    हैं    संत्रास  , पुलाव   खयाली खाते ,
सोच  बेतुकी   बात , खोपड़ी   खूब  घुमाते.
कह गुलिया कविराय ,जुगत ये देखी भाली ,
दूर   रहें    शैतान ,   रहोगे  गर   ना  खाली .
5.
कहते  हैं  कुछ  और  ये , करते हैं कुछ और ,
बोलो  इनकी  बात   पर , कौन  करेगा   ग़ौर .
कौन करेगा ग़ौर ,  अज़ब  है   इनकी    गाथा .
दुखे भले ही पेट ,  बताएं   जग    को    माथा .
कह गुलिया कविराय , राज़  ये  बनकर  रहते ,
करें  कहाँ  वो  काज , जिसे  ये  हरदम  कहते .
6.
आने  का  उल्लास  ना , ना जाने  का  शोक ,
जाने   कैसे   हो  गया , कपट  भरा  ये लोक .
कपट भरा ये लोक , नहीं अब मन को भाता ,
हुए  मतलबी  लोग ,  किसे  है कौन  सुहाता .
कह गुलिया कविराय , गए  वो  बीत  जमाने ,
हों  कितने  भी  मीत , एक न काम वो आने .
7.
करते    कहने  से  नहीं , भूल चूक को ठीक ,
नहीं फटकना भूल कर , उनके तुम नजदीक .
उनके  तुम नजदीक , बात  जो   नाहीं   मानें ,
सुनकर नेक सलाह ,  भृकुटि  बेमतलब तानें .
कह गुलिया कविराय , बदी से जो जन डरते ,
गलत काम को ठीक ,  वही कहने  से  करते .
8.
पाते  अहमक़ जो कभी,  यहाँ  तनिक  अधिमान ,
धर्म  तभी   है   झेलता ,  कदम   कदम  अपमान .
कदम कदम अपमान ,  गुणी   कब  उन्हें   सुहाते ,
देते    जब   भी   राय ,   तभी  वे  मुँह  की   खाते .
कह  गुलिया कविराय ,   बात   ये   सभी   बताते ,
अधर्मी       और   मूढ़ ,     कहीं  ना  आदर  पाते .
9.
डाले   हरदम   वोट   ये , लेकर  मन में आस ,
इक ना इक दिन तो सुने , जनसेवक अरदास .
जनसेवक अरदास ,  रही   ये   आस  अधूरी ,
लेकर हमसे वोट , करें   हर    हसरत     पूरी .
कह गुलिया कविराय , सभी  ये  देखे    भाले ,
बंदा   अपना   वोट , बताओ   किसको  डाले .
10.
आए  कल  घुसपैठिए ,  आज  हुए  हैं  वोट ,
लोकतंत्र का एक दिन , गला   यही   दें  घोट .
गला  यही   दें  घोट , बाज़   ना   नेता  आते ,
कुछ तो करें  विरोध , गले  कुछ  इन्हें लगाते .
कह गुलिया कविराय , यही इक पीड़ सताए ,
होगा   क्या    अंजाम , हमें  ये  समय बताए .


संपर्क सूत्र :-
            राजपाल सिंह गुलिया 
राजकीय प्राथमिक पाठशाला भटेड़ा 
तहसील व जिला - झज्जर ( हरियाणा )

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