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                  कुण्डलिया छंद 
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1.
बातें  सुनकर  झूठ  की , सब  जन  थे संतुष्ट ,
सच आया  जब  सामने , हुए  बहुत  से  रुष्ट .
हुए बहुत से रुष्ट , सत्य   अब  किसे   सुहाए ,
झूठ लगाए दौड़ , जहाँ  सच   चल  ना  पाए .
कह गुलिया कविराय , सत्य को मिलती मातें ,
पाती आदर मान ,  आजकल     झूठी   बातें .

2.
क़र्ज़ बुरा है  बाप का , लो बस इतना मान ,
इसे  फूस   से  तापना , कहें  गुणी   इंसान  .
कहें गुणी  इंसान , रात  निंदिया  ना   आवे ,
सिर पर रहे सवार , शाह   जी  रोज  डरावे .
कह गुलिया कविराय , यार  ये  मर्ज़ बुरा है ,
देखे    ना   दिन  रात , सताए  क़र्ज़  बुरा है .

3.
डालें   हरदम   वोट  वो , मन  में   लेकर आस ,
इक ना  इक दिन तो सुने , जनसेवक  अरदास .
जनसेवक अरदास , कहाँ कब किसकी सुनता , 
लेकर   भागे    वोट , यही  है   खास  निपुनता .
कह गुलिया कविराय , वहम ना दिल  में  पालें ,
जनहित जिसकी सोच , वोट उसको  ही  डालें .

4.
तेरा  मेरा   कर   रहे ,  नहीं  ईश  का   ध्यान ,
घर से निकलें भोर में ,  ज्यों नभ में दिनमान .
ज्यों नभ में दिनमान , सुबह से शाम विचरता ,
करे न  जन   आराम , हमेशा  कारज  करता .
कह गुलिया कविराय , पकड़ ले खाट कमेरा ,
हो  उस  दिन  मालूम , नहीं   है  कोई    तेरा '

5.
चाहत दौलत की सदा ,  पैदा   करे    फ़ितूर ,
मन  में  गर  संतोष हो , खुशी   मिले  भरपूर .
खुशी  मिले भरपूर , रहे  ना  इच्छा  धन  की ,
खूब   कमाएं  दाम ,  हुई  ये  हसरत जन की .
कह गुलिया कविराय , मिलेगी   कैसे   राहत ,
घटा  आज   परितोष , बढ़ी है धन की चाहत .

6.
कारज करना बाद में , पहले    सोच- विचार ,
बिना विचारे जो  करें , मिलती  उनको   हार .
मिलती उनको हार , न  कभी व्यूह सा  रचते ,
करते खूब विचार  , शत्रु  कब   उनसे  बचते .
कह गुलिया कविराय , न दोष ग़ैर सिर धरना ,
पहले   सोच   विचार ,  बाद में कारज करना .

7.
तोड़ो  नहीं  उसूल  को , चुनो  गलत  ना  राह ,
प्यासा चातक ताल की ,  मानें  कहाँ    सलाह .
मानें कहाँ सलाह , भरा   वह   नीर  न    पीता ,
एक बूँद की आस , धरे   धीरज    वह    जीता .
कह गुलिया कविराय ,कभी न  सत्य पथ छोड़ो ,
मिलें सुखद परिणाम , सनातन  नियम  न तोड़ो .

8.
झूठे   पाते   पत   नहीं , हो  सच्चे  का  मान ,
झूठ साँच की बस यही , मिली एक  पहचान .
मिली एक पहचान , छुपे   ना   झूठ   छुपाए ,
मिलकर लाखों झूठ ,हरा  ना  सच  को पाए .
कह गुलिया कविराय , चलन ये  देख अनूठे ,
सच  सहता  अपमान , मान  अब पाते  झूठे .

9.
मानें  बातें    ग़ैर     की , खुद में नहीं  विवेक ,
ऐसे  भकुआ  लोग भी , मिलते  यहाँ  अनेक .
मिलते यहाँ अनेक ,  पालतू    जीवन   जीते ,
लिए पराई   प्यास , लहू  अपनों   का   पीते .
कह गुलिया कविराय , मर्म  ना  इतना  जानें ,
उनको     कैसे   आप , बताओ  ज्ञानी   मानें .

10.
आशा  औ'  विश्वास  का , लें  जो  दामन थाम ,
मिलता उनको एक  दिन , अपना सही मुक़ाम .
अपना सही मुक़ाम , वही जन  हासिल  करते ,
मकसद जिनका नेक , नहीं   संकट  से   डरते .
कह गुलिया कविराय , विपद ने  जिसे  तराशा ,
माने  ना    वो    हार , बसी है जिस मन आशा .

संपर्क सूत्र :-
            राजपाल सिंह गुलिया 
राजकीय प्राथमिक पाठशाला भटेड़ा 
तहसील व जिला - झज्जर ( हरियाणा )

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